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मेरा शहर बांसवाड़ा (My City Banswara)



राजस्थान का दक्षिणी सिंहद्वार बांसवाड़ा जिला अपनी कई ख़ासियतों की वजह से प्रदेश व देश में अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

नैसर्गिक सुषमा, नदी-नालों-झरनों से चरेवैति-चरेवैति का कलनाद, मालवा और गुजरात के सामीप्य से लोक संस्कृतियों के त्रिवेणी संगम, ऋषि-मुनियों-सिद्धों और पाण्डवों के विहार, इन्द्रधनुषी मेलों-पर्वों की मौज-मस्ती, मनोहारी जनजातीय लोकजीवन, कला-संस्कृति, शिल्प-स्थापत्य, पुरा धामों, दर्शनीय व पर्यटन स्थलों, ऐतिहासिक घटनाओं और साम्प्रदायिक सौहार्द भरी आध्यात्मिक चिंतन धारा से लेकर आधुनिक विकास तक के तमाम क्षेत्रा इस अंचल को गौरव प्रदान करते हैं।

बाँसवाड़ा अत्यंत पुरातन क्षेत्र है। इस समूचे भूभाग को स्कन्द पुराण अन्तर्गत कुमारिका खंड में वर्णित किया है। इस वागड़ प्रदेश को नाग खण्ड, लाट प्रदेश, गुप्त क्षेत्रा आदि कहा गया है।

पाण्डवों ने अपने वनवास काल में इस अंचल में भी विहार किया है। उन्हीं की याद में आज भी घोटिया आम्बा पर विशाल मेला भरता है। यहाँ पाण्डव कुल की प्रतिमाएं पूजी जाती हैं। इसके अलावा भीमपुर, भीमसौर, अरथुना, परतापुर, पाँचलवासा, नोकला, सरेड़ी व खोड़न का संबंध भी पांडवों से जोड़ा जाता है।

ऋषि-मुनियों, सिद्ध योगियों व तपस्वी राजाओं के लिए भी यह क्षेत्रा महत्वपूर्ण रहा है। विट्ठलदेव के पास नीलकण्ठ मंदिर में मालवा राजा भर्तृहरि का शिलालेख भी पाया गया। कई स्थानों पर खेतों से सम्राट कनिष्क काल के सिक्के प्राप्त हुए हैं। त्रिपुरा सुन्दरी मंदिर के पीछे तीसरी शताब्दी में सम्राट कनिष्क के काल का शिवलिंग स्थापित है।

यहाँ के अधिकांश शिलालेख संस्कृत में हैं, जिनमें इस क्षेत्रा को ‘वाग्वर’ कहा गया है। वाक्  अर्थात वाणी और वर अर्थात श्रेष्ठ। इस तरह विद्वानों के क्षेत्रा के रूप में इस अंचल को प्रसिद्धि थी। वाग्वर बाद में अपभ्रंश होकर वागड़ रह गया। कुछ की मान्यता है कि यह क्षेत्रा सघनतम वनाच्छादित था इसलिए इसे वागड़ कहा गया। गुजराती में वगड़ा शब्द वन प्रदेश के लिए इस्तेमाल होता है।

जिले की 70 फीसदी से ज्यादा जनसंख्या आदिवासी भीलों की है। भील या मीणा भारत के प्राचीनतम निवासियों में से हैं। कर्नल टाॅड़ ने इनका नाम ‘वन पुत्रा’ रखा है जो सदियों से जंगलों में रहते आए हैं।

भौगोलिक स्थिति       

        बांसवाड़ा राजस्थान के मानचित्रा में धु्रव दक्षिण में स्थित है। अरावली की उपत्यकाओं से आवेष्टित बांसवाड़ा जिले का क्षेत्राफल 5065 वर्ग किलोमीटर एवं वनों के अन्तर्गत कुल क्षेत्रा 1236.66 वर्ग किलोमीटर है। यह जिला 23डिग्री 11 इंच से  23 ड़िग्री 56 इंच उत्तरी अक्षांश तथा 74 डिग्री 00 इंच से 74 डिग्री 47 इंच पूर्वी देशान्तर के मध्य स्थित है। इसके उत्तर में उदयपुर जिले की धरियावद तहसील और चित्तौड़गढ़ जिले की प्रतापगढ़ तहसील, पूर्व में मध्यप्रदेश का रतलाम जिला, पश्चिम में डूंगरपुर जिले की सागवाड़ा व आसपुर तहसीलें और दक्षिण में मध्यप्रदेश का झाबुआ जिला स्थित है। दक्षिण-पश्चिम में यह गुजरात राज्य के पंचमहाल जिले की सीमा को भी स्पर्श करता है।  बाँसवाड़ा वह महत्वपूर्ण जिला है जिसके मध्य से होकर कर्क रेखा गुजरती है।

क्षेत्रा का धरातल उबड़-खाबड़ है। बीच-बीच में बांसवाड़ा के पश्चिम में छोटी पर्वत श्रेणियां हैं। जिले के पूर्वी भाग में डैकन ट्रेप की चपटे शिखर की पहाड़ियां हैं। मैदानों में अधिकांशः ब्लैक काॅटन मिट्टी है। बांसवाड़ा के पश्चिम में छोटी पर्वत श्रेणियां हंै।

जिले में विशाल जंगल एवं पर्याप्त नदी-नाले और मीलों तक पसरी माही की नहरें अपना अलग ही संगीत सुनाती हैं। प्रकृति इस जिले पर विशेष रूप से मेहरबान रही है।

जिला आकृति में चतुष्कोणीय और पश्चिम में खासा खुला हुआ है किन्तु इसकी प्रवृत्ति लहरदार है। जिले का मध्यवर्ती व पश्चिमी मैदानी भाग कृषि योग्य है। जिले के पूर्र्वी आधे भाग में अरावली की पर्वत श्रेणियां छितरी हुई हंै। जिले का सामान्य स्तर समुद्र तल से 350 मीटर ऊँचा है। उत्तर में 440 मीटर और पूर्व में 510 मीटर है। दक्षिण में कुशलगढ़ से 6 मील उत्तर की एक उच्चतम श्रेणी लगभग 610 मीटर है। जिले के उत्तर से दक्षिण तक लम्बाई 58 मील और पूर्व से पश्चिम तक चैड़ाई अनुमान 50 मील है।


नदियां

प्रकृति इस जिले पर विशेष रूप से मेहरबान रही है। जिले में विशाल जंगल एवं पर्याप्त नदी-नाले हैं। माही नदी बांसवाड़ा के लिए नैसर्गिक वरदान है जिस पर विशालकाय बांध बना है। बांसवाड़ा जिले की मुख्य नदी माही कुछ वर्ष पहले तक बहुधा साल भर बहती रही है।


जिले में बहने वाली मुख्य नदियों में माही, अनास, चाप एवं एराव हैं जबकि सहायक नदियों में हिरन, कागदी आदि हैं। इसके अलावा जिले के विभिन्न हिस्सों में अनेक नदियां, नाले, कलात्मक एवं पौराणिक महत्व की बावड़ियां, तालाब, कूप इत्यादि हैं।

आकृति में चतुष्कोणीय बांसवाड़ा जिला अपने भीतर 4 हजार कलापूर्ण देवालय, 400 विशाल व्यापिकाओं और 37 कुण्डों की सांस्कृतिक-पुरातात्विक धरोहरों को समाए हुए है वहीं माही की नहरें यहाँ धमनियों की तरह क्षेत्रा भर में पसरी हुई विकास का संगीत सुना रही हैं।

माही (मही-सागर)  नदी का निकास मध्यप्रदेश के धार जिले में अवस्थित अमझेरा क्षेत्रा से है। यह धार, रतलाम और झाबुआ जिलों में बहती हुई राजस्थान में प्रवेश कर दो मील तक रतलाम और बांसवाड़ा की सीमा काटकर पूर्व में खांदू के पास बांसवाड़ा में प्रवेश करती है और 40 मील उत्तर में बहती हुई उदयपुर और डूंगरपुर राज्य की सीमा तक चली जाती है। वहां से यह पश्चिम में मुड़कर बांसवाड़ा और डूंगरपुर जिलों की सीमा पर बहती हुई, गुजरात के माहीकांठा तथा रेवा कांठा में प्रवेशकर खंभात की खाड़ी में जा गिरती है। बांसवाड़ा तथा उसकी सीमा के आस-पास इसका बहाव करीब 100 मील है। अब इस नदी पर बांसवाड़ा जिले में बोरखेड़ा स्थान पर विशाल बाँध बना दिया गया है।

माही के बाद अनास एवं एराव प्रमुख नदियाँ हैं। एराव प्रतापगढ़ से निकलकर बाँसवाड़ा जिले में प्रवेश करती है। इस नदी के बारे में रोचक कहावत प्रचलित रही है - ‘ सब नदियाँ सीधी बहें, उल्टी बहे एराव।’

जलवायु

जिले की जलवायु अर्द्ध शुष्क है। राजस्थान की दक्षिणी सीमा पर स्थित इस जिले की जलवायु उत्तर व पश्चिम के रेगिस्तानी प्रदेशों की जलवायु की अपेक्षा बहुत कुछ नरम है। औसतन अधिकतम तापमान 480   सेन्टीग्रेड़ व न्यूनतम 70 सेन्टीग्रेड़ तथा औसतन तापमान 260 सेन्टीग्रेड़ है। सामान्य वर्षा 992.4 मिमी होती है तथा औसत आर्द्रता 62.6 प्रतिशत है। वर्ष 2006 में औसत वर्षा का आंकड़ा 100 इंच को भी पार कर गया।



यहां की जलवायु सामान्यतः आरोग्यप्रद नहीं है। वर्षा ऋतु के बाद दो महीने तक लोगों को प्रायः मलेरिया व अन्य मौसमी संक्रामक रोगों की शिकायत रहती है। इस जिले की भूमि का अधिकांश भाग खेती के लिए अच्छा है। यहाँ जमीन काली और चिकनी है, जो कपास के लिए उपयोगी है।

खेती में खरीफ व रबी की दोनों फसलें होती हंै। माही के सिंचित क्षेत्रा में जागरुक किसान तीन फसलें भी लेने लगे हैं। सिंचित क्षेत्रों में माही की नहरों तथा असिंचित क्षेत्रों में कूप, तालाबों व अन्य जलस्रोतों से सिंचाई होती है।

जिले के पश्चिम और दक्षिण ओर की समतल भूमि भूरी और रेतीली है जो खेती के लिए बहुत उपयोगी है जबकि दक्षिण-पश्चिम में तथा वहां से कई मील तक की जमीन काली है, जिसमें रबी की फसल भी अच्छी होती है। जिले में खरीफ व रबी में सभी प्रमुख फसलें होती हैं।


खनिज एवं भौमिकी
यह जिला खनिज सम्पदा की दृष्टि से सम्पन्न है। जिले में मार्बल, सोप स्टोन, डोलोमाईट, लाईमस्टोन, मेसेनरीस्टोन, बजरी, ईंट मिट्टी के पर्याप्त भण्डार हैं। जिले की घाटोल तहसील में सोने के भण्डारों का पता चला है। इस संबंध में कई वर्षों से सर्वेक्षण जारी है। यह जिला रेल सुविधा पाने के लिए निरन्तर प्रयास कर रहा है।

प्राचीनतम अरावली-पूर्व संरचनाओं में शीष्ट, नाईस, मिगमेटाईट आदि हैं, इसके बाद अरावली सुपर ग्रुप के सदस्य यथा फाइलाइट, ग्रेवेक और मैटावाल्केनिक आदि है। इनमें लगभग 21 हजार लाख वर्ष पूर्व ग्रेनाइट व पेगमेटाइट समिश्र हुए हंै। जिले के पूर्वी भाग में इन शैलों के ऊपर डेकन ट्रेप के स्राव फैले हैं जो लगभग 650 लाख वर्षों से पहले पृथ्वी के भू पटल में अनेकों दरारों से निकले माने जाते हंै।

अन्य खनिजों से सम्पन्न होने के अतिरिक्त बांसवाड़ा राजस्थान का एकमात्रा जिला है जहां ग्रेफाइट व मैगनीज के उल्लेखनीय भण्डार पाये जाते हैं।

बांसवाड़ा और घाटोल के बीच 35 किमी की लम्बाई में पपड़ीदार व बेड़ौल विविधताओं के ग्रेफाइट की अनियमित पट्टियां फैली हुई हैं। हतखेड़ा, पांचलवासा, इम्पलीपाड़ा, तासकोटा, माहीबांध क्षेत्रा आदि में ग्रेफाइट की एक से लेकर दस मीटर की विभिन्न मोटाई की पट्टी की खोज की गयी है। इनमें ग्रेफाइट का अंश 5 से 15 प्रतिशत के मध्य है। इसके लगभग 1.3 लाख टन भंडार का अनुमान किया गया है। ग्रेफाइट का उपयोग ढलाई कारखानों में, ग्रेफाइट कुढाली व लैड पेन्सिल के उत्पादन में, चिकनाई स्नेहन के रूप में और अन्य उद्योगों में किया जाता है।

खमेरा और बांेगरा के बीच में लगभग 10 वर्ग किमी के क्षेत्रा में कैल्क नाइस और एम्कीबेलाइट से संयुक्त चूना पत्थर और संगमरमर पाया जाता है। चूना पत्थर का कुछ भाग लगभग 500 लाख टन सीमेंट श्रेणी का है।

21.9 से 48.0 प्रतिशत धात्विक अंश सहित कच्चा मैगजीन सवनिया, खूंटा सागव, इटाला, भातरी, ताम्बेसरा, डोमगाडिया आदि स्थानों पर मिलता है। ताम्बेसरा, सिवनिया व खंूटा क्षेत्रों में इसके अनुमानित भंडार 250 हजार टन हंै।

घीया पत्थर के अतिरिक्त जिले में पाथराईट व पायरहोटाइट से संयुक्त खनिज तांबा झरखा, भूकिया, परसोला, जगपुरा, हड़मतिया आदि स्थानों में और फास्फोराइट सल्लोपात व राम का मुन्ना स्थानों में पाया जाता है।


वन, वनस्पति व जीव-जंतु

बांसवाड़ा जिले में वन, जिनमें मुख्यतया सागवान है, अरावली पहाड़ियों के ढलानों पर और लहरदार धरातल पर स्थित है। ये खुश्क पतझड़ी किस्म के, अनियमित और घनत्व में बहुत विभिन्न है। मैदान से वन अधिकतर समाप्त हो गये है। कृषीय क्षेत्रों में अब केवल महुआ के पेड़ पाये जाते हैं।

वनस्पति के दृष्टिकोण से जिले में सिंधु मैदान और मध्यभारत के वानस्पतिक प्रदेश है क्योंकि यह मध्य प्रदेश के बहुत अधिक निकट है। मुख्य प्रजातियां हैं - खाखरा(ब्यूटिया मोनोस्पर्मा) के साथ कंजेरी (होलीप्टेलिया इन्टेग्रीफोलिया), कलम (मिट्राजायनापरवीफोलिया), सादार (टर्मिनालिया टोमेंटोसा), गुरार (एलबीजिया प्रोसेरा)। पहाड़ियों की तलहटी के साथ व पहाड़ी ढलानों के मध्य त सागवान के साथ टिमरू (डायोस्पायरोस मैलनोक्सीलोन), धावड़ा (एनोगाइसस लेटिफोलिटा), गुर्जन (सोनिया ग्रेन्डिस), बारबेट (दलबेरजिया येनीक्यूलाटा), खैर (एकेसिया केटेचू), मोखा (श्रिबेरा स्वायटनियाआइड), बेहटा (टर्मिनलिया बलेरिका) आदि है। उच्चतर ढलानों पर सागवान का स्थान शनैः शनैः विविध प्रजातियां ले लेती है जिनमें मुख्यतया शौरा, गुर्जन, मोखा और सालार कहीं-कहीं आंवला, पाईया (डलबेरिजिया लेटिफोलिया), बिया (टेरोकार्पस मार्सूपियम), तनाज (औगेनिया डेल्बर्गियोआईड), कराई (स्टेरक्यूलिया यूरेन्स) आदि के साथ मिश्रित है।

सामान्य लताओं में मालकांगनी (सिलेस्ट्रम येनीक्यूलेट), चारमोई (एब्रम प्रिकेटोरिस), चिल्लाती (केसलपीनिया सेपियारिया) डाईजियोरिया एस.पीपी., कोईकेलार एस.पीपी. वाईटस एस. पीपी. आदि है।

जिले में पाई जाने वाली सामान्य घासें हैं सेवन (सेहिमा नर्वासम), रूसिया (सिम्पोपोगोन माटिनिआई), मोती बिहारी (क्लोरिस इन्कम्प्लीट या थेमिडा क्वाड्रिवल्विस), लाप (हाटरोपोगोन कंर्टोटस या बोथर््ियोक्लोआ परटूसा), फूलकिया (अप्लूडा म्यूटीका), डाइकेन्थियम एन्यूलेटम, एरिस्टिडास हिस्ट्रिक्स, लेंझरस सिलियेरिस।

वन्य जीवों में जंतुओं, रेंगने वाले जानवरों और मछलियों की बहुसंख्य विविधतायें सम्मिलित है। तेंदुआ बहुत ही कम पाया जाता है।

वन की कुशलगढ़ शृंखला के दूरदराज  भागों में और घाटोल शृंखला के रोहल उंडवाला खंड में चिंकारा (गैजेला बेनेटी) रोजब (बोसिलेफस ट्रगेकेमकलस) और चैसिंगा हिरण (टेट्रासिरस क्वाड्रिकार्निस) बहुत कम देखे जाते हंै। सांभर, जंगली सुअर और चीतल जो इन वनों में अक्सर घूमते रहते थे अब लुप्तप्रायः हो गये है। विभिन्न किस्मों की गिलहरियां, छिपकलियां और सांप वन के करीब-करीब सभी भागों में पाये जाते है।

जिले में पक्षीजीव फिर भी सामान्य और विविध है। ग्रे जंगल फाउल (कैलस कानेरिटी) रैड स्पर फाउल (कैलोक्सपेरिडिक्स स्पेडीसिय) और धूसर तीतर (फ्रेंकोलिनस पौंडीसेरियनम) वनों के अत्यन्त दूरस्थ भागों में ही सीमित है। ब्लेक ड्रोंगो, ग्रश्राइक, ग्रीन बी ईटर, रेड वेटेड बुलबुल, तोता (पैरट), जंगली कौवा, हाउस स्पैरो, पर्पल सनबर्ड, कठफोड़वा, वईट स्पाटेल फैनटेल, फ्लाई कैचर, सामान्य मैना आदि इस जिले में पाये जाने वाले अन्य सामान्य पक्षी है।

जिले में माही, अनास, चाप, ऐराव तथा सुरवानिया, हरो व बाई तालाब बांध के पानी से मेजर कार्पस कैट फिश तथा मछलियों की अन्य विविध किस्में उपलब्ध है। इनके अतिरिक्त अन्य पायी जाने वाल मछलियां बाम (मस्टासिम्बेलस एरिमेटस), चाल (चेला सीएलिया), चिप्पड़ (बोटिया लोहचटा), पुट्टी (बारबस टिक्यो) और सुइया (बेलन कैंसीला) है।


ऐतिहासिक पृष्ठ भूमि

बांसवाड़ा जिला वागड़ अथवा वागड़ नाम से विख्यात ज्ञात प्रदेश का भाग है जिसकी राजधानी वटपद्रक (वर्तमान बड़ोदा) में हुआ करती थी। यह क्षेत्रा लगभग 4 हजार वर्ष पूर्व की अहाड़ नामक सभ्यता का साक्षी रहा है।

वागड़ के प्रारम्भिक इतिहास का अविच्छिन्न विवरण अस्पष्ट है। इस पर पश्चिमी क्षत्रापों का शासन था। सन् 181 से 353 ईसवी काल के चाँदी के सिक्कों का एक जखीरा जिले के ग्राम सुरवानिया में खुदाई से प्राप्त हुआ था और यह ग्यारह महाक्षत्रापों व दस क्षत्रापों को निर्धार्य है।

महाक्षत्रापों में अन्तिम रूद्रसिंह तृतीय था जो 388 ईस्वी में चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य द्वितीय द्वारा पराजित किया गया जिसके बाद प्रदेश गुप्तों द्वारा शासित रहा होगा जिन्हें हूण सम्राट तोरामन द्वारा विक्रम संवत् 556 (499ईस्वी) के लगभग हटा दिया गया। मिहिरकुल (तोरामन का पुत्रा) मालवा के यशोधर्मन द्वारा पराजित किया गया जिससे हूण शासन का अंत हुआ।

वागड़ वलभी साम्राज्य का भाग रहा हो सकता है। प्रदेश पर 725 से 738 ईस्वी के बीच अरबों द्वारा आक्रमण किया जाना बताया जाता है लेकिन उन्हें मेडापत (मेवाड़) के गुहिलोतों द्वारा बाहर निकाल दिया गया।

लगभग 10वीं शताब्दी  ईसवी के प्रारंभ में परमारों द्वारा वागड़ को जागीर में प्राप्त किया जाना प्रतीत होता है। परमारों ने उत्थुनक अथवा वर्तमान अर्थुना को अपनी राजधानी बनाकर देश का शासन किया। वागड़ के परमारों में सर्वाधिक उल्लेखनीय कंकदेव और मंडलीक थे। वागड़ के परमारों में अंतिम, जिसके बारे में कुछ ज्ञात है, विजयराज था जो 1109 ईस्वी तक जीवित रहा। परमारों को 1171 अथवा 1175 ईस्वी के लगभग मेवाड़ सामन्तसिंह द्वारा अंतिम रूप से निकाल दिया गया।

यह प्रदेश फिर से गुजरात के सोलंकी या चालुक्यों के हाथ में चला गया जिनके पास यह 1196 ईस्वी तक बना रहा। इसके बाद सामन्तसिंह के गुहिलोत उत्तराधिकारी फिर से सामने आये। वागड़ के पूर्वी भाग में बाँसवाड़ा और पश्चिम भाग में डूंगरपुर है। गुहिलोतों द्वारा वागड़ राज्य की स्थापना के संबंध में विभिन्न मत पाये जाते हैं तथापि वास्तविक संस्थापक सामन्तसिंह ही था जिसने 1179 ईसवी के लगभग वागड़ प्रदेश को अधिकृत किया।
          सामन्तसिंह के पुत्रा सिंहदेव के पौत्रा वीरसिंह देव (विक्रम संवत् 1343-1349) तक वागड़ के गुहिल वंशीय राजाओं की राजधानी बड़ौदा (डूंगरपुर) थी। जब वीरसिंह के पौते डूंगरसिंह ने डूंगरपुर शहर बसाकर उसे अपनी राजधानी बनाया तब से वागड़ के राज्य का नाम उसकी नई राजधानी के नाम से ‘‘डूंगरपुर’’ प्रसिद्ध हुआ।

    बांसवाड़ा नगर की स्थापना के संदर्भ में शामलदास कृत वीर विनोद, गौरीशंकर ओझा कृत ‘राजपूताना का इतिहास’ भाग 2 व 3 आदि प्रमुख आधार ग्रंथ हैं। ऐतिहासिक वृतान्त से यह ज्ञात होता है कि खनुआ के युद्ध (1526) में डूंगरपुर के महाराणा उदयसिंह मेवाड़ की सेना के साथ बाबर के विरूद्ध लड़ाई में मारे गए। उदयसिंह के दो बेटे थे - बड़े लड़के का नाम पृथ्वीराज व छोटे का नाम जगमाल था। डूंगरपुर की गद्दी पर पृथ्वीराज बैठा। जगमाल अपने भाई के विरूद्ध विद्रोही हो गया। प्रारंभ में पृथ्वीराज ने अपने भाई के विद्रोह को दबाने का प्रयास किया परन्तु अंत में दोनों भाइयों में समझौता हो गया और समझौते के अनुसार डूंगरपुर पृथ्वीराज के पास रहा और जगमाल को बांसवाड़ा का इलाका दिया गया।

कहीं यह उल्लेख भी है कि रावल उदयसिंह ने जीते जी ही डूंगरपुर राज्य को दो हिस्से कर पश्चिम हिस्सा अपने ज्येष्ठ पुत्रा पृथ्वीराज को दिया जिसकी राजधानी डूंगरपुर रही और जगमाल की बांसवाड़ा। बांस के जंगलों की बहुतायत अथवा मेजर-अर्सकिन के अनुसार यहां के प्रतापी शासक बांसिया भील को जगमाल द्वारा मार दिए जाने के फलस्वरूप इस क्षेत्रा का नाम बांसवाड़ा प्रसिद्ध हुआ।

किन्तु जगमाल के शासन से पूर्ववर्ती एक शिलालेख में बांसवाला नामक ग्राम का उल्लेख है। इसके अलावा इस स्थल का नाम वंशपुर, बंसबहाल आदि भी मिलता है। 

    समकालीन पुस्तक ‘मिराते सिकन्दरी’ (1531 ई. में लिखी) के अनुसार ‘‘ बहादुरशाह गुजराती ने पृथ्वीराज और जगमाल को यह मुल्क बांट दिया।’’ मेवाड़ की पोथियों में महाराणा रत्नसिंह का वागड़ के दो हिस्से करवा देना लिखा है।

जिले के कलिंजरा तथा आस-पास के क्षेत्रों में प्राप्त अवशेषों से पता चलता है कि शक और हूण जातियों का प्रभाव यहां रहा है। जनश्रुति है कि सन् 1857 की क्रांति के उपरांत तांत्या टोपे तलवाड़ा के पास फाटीखाण गुफा (रामकुंड) में रहे। राणा उदयसिंह को बचाने के लिए पन्नाधाय यहीं से होकर ईडर गई थी। महाराणा प्रताप ने भी पीपलखूंट क्षेत्रा के बीहड़ वनों को अपना विहार क्षेत्रा बनाया।

    जगमाल के बाद बांसवाड़ा की गद्दी पर विभिन्न राणा समय-समय पर आसीन होते रहे। बांसवाड़ा रियासत उदयपुर से स्वायत्ता प्राप्त करने के लिए प्रयास करती रही। महाराणा उदयपुर उनकी स्वायत्ता अस्वीकृत करते रहे।
    अकबर ने मेवाड़ आक्रमण के समय बांसवाड़ा के कलिंजरा ग्राम में निवास किया था इसका प्रमाण कलिंजरा से प्राप्त शिलालेख है। बांसवाड़ा के अजबसिंह ने औरंगजेब से सहायता प्राप्त कर मेवाड़ द्वारा जब्त गांवों को पुनः प्राप्त किया।

    सन् 1818 में बांसवाड़ा रियासत ने अंग्रेजी सरकार की अधीनता स्वीकार कर ली। यह संधि बांसवाड़ा के रावल उम्मेदसिंह व लार्ड हेस्टिंग के प्रतिनिधि चाल्र्स मेटकाफ के मध्य हुई। इस संधि के दस्तावेज आज भी बीकानेर के आर्किव्स में सुरक्षित हंै। इस सहायक संधि से बांसवाड़ा भी अंग्रेजी राज की एक देशी रियासत बन गई।

इस समय से लगाकर लगभग 1859 तक का इस प्रदेश का इतिहास विभिन्न राज्यों व जागीरों में आपसी लड़ाई-झगड़ों का इतिहास है जबकि ब्रिटिश सरकार ने भारत में अपनी पकड़ पूरी कर ली थी।

महारावल कुशलसिंह 1660 ईस्वी में गद्दी पर बैठे और कहा जाता है कि उन्होंने भील प्रदेश जीत लिया, जिसका नामकरण उन्होंने अपने नाम पर कुशलगढ़ किया और इसे ठाकुर अखयराज को जागीर स्वरूप दिया। कुछ अन्य विद्वानों के मतानुसार इस प्रदेश को ठाकुर अखयराज ने एक भील सरदार कुशला से जीता था और इसका नाम उसके नाम पर कुशलगढ़ रखा।

वर्ष 1866 में बांसवाड़ा के महारावल लछमनसिंह और उसके सामन्त कुशलगढ़ के राव के बीच गंभीर झगड़ा खड़ा हो गया जिस पर यह निर्णय किया गया कि बांसवाड़ा के शासक कुशलगढ़ ठिकाने के राजकाज में किसी भी प्रकार की कोई दखलन्दाजी नहीं करेंगे और कुशलगढ़ के राव बांसवाड़ा को 1 हजार 100 रुपए का वार्षिक नज़राना देंगे और परम्परागत सेवाएं करते रहेंगे।

बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों में वागड़ में गोविन्द गिरि नामक साधु केनेतृत्व में भीलों में जबरदस्त समाजसुधार का अभियान शुरू हुआ। इसमें शराब पीना व बेगार देना छोड़ने का आन्दोलन चला। इसे ब्रिटिश सेना की सहायता से कुचल दिया गया। कहा जाता है कि गुजरात की सरहद से सटे बांसवाड़ा जिले के आनन्दपुरी के समीप अवस्थित मानगढ़ पहाड़ी पर गुरु गोविन्द गिरि के हजारों भक्त जमा हुए। यह घटना मार्गशीर्ष पूर्णिमा, 17 नवम्बर 1913 की बतायी जाती है। मानगढ़ पहाड़ी पर भीलों के समूह पर तोपों और बन्दुकों से आक्रमण किया गया जिसमें लगभग 1500 आदिवासी हताहत हुए।

इस बारे में रियासती दस्तावेजों में कहा गया है कि 1913 में भीलों ने गोविन्द गिरी और पूंजा के नेतृत्व में विद्रोह किया जिसे नवम्बर 1913 में अंग्रेजी फौजों की सहायता से दबा दिया गया। सन्1944 में बांसवाड़ा रियासत के तत्कालीन महारावल पृथ्वीसिंह की मृत्यु के बाद चन्द्रवीरसिंह ने राजसिंहासन संभाला।

सन् 1945 में उत्तरदायी सरकार की स्थापना के उद्देश्य से बांसवाड़ा में प्रजामण्डल नामक संगठन, शासक/पाॅलिटिकल एजेंट के अधीन बनाया गया, जिसके द्वारा विभिन्न प्रशासकीय व अन्य सुधारों की मांग की गयी। इस समय भूपेन्द्रनाथ त्रिवेदी बांसवाड़ा रियासत के प्रथम प्रधानमंत्राी बने।

भारत आजाद होने के बाद रियासतों के भारतीय संघ में विलय के साथ ही बांसवाड़ा रिसायत और कुशलगढ़ ठिकाने का वृहत्तर राजस्थान के संयुक्त राज्य में वर्ष 1949 में विलय हो गया और इन जागीरों को मिलाकर बांसवाड़ा नामक एक पृथक जिला बना दिया गया।  बांसवाड़ा की स्थापना का सम्पूर्ण इतिहास अभी अस्पष्ट है तथा इस पर व्यापक शोध की आवश्यकता है।



जनसंख्या

        सन 2001 की जनगणना के अनुसार बांसवाड़ा जिले की कुल जनसंख्या 15 लाख 1 हजार 589 है। इसमें 76 हजार 686 पुरुष व 74 हजार 903 महिलाएं है। जिले की ग्रामीण जनसंख्या 13 लाख 94 हजार 226 है जबकि शहरी जन संख्या एक लाख 7 हजार 363 है। कुल जनसंख्या में शहरी जनसंख्या का प्रतिशत मात्रा 7.14 है। सन् 1991 से 2001 तक दशकीय जनसंख्या वृद्धि दर 29.94 प्रतिशत रही है।

          जिले में लिंगानुपात (प्रति एक हजार पुरुषों के मुकाबले महिलाओं की संख्या) 974 है। जिले में अनुसूचित जनजाति की जनसंख्या 10 लाख 85 हजार 272 है जबकि अनुसूचित जाति की संख्या 64 हजार 336 है। प्रति वर्ग किलोमीटर जन संख्या घनत्व 298 है।  बाँसवाड़ा जिला जनसंख्या की दृष्टि से राज्य में 19 वें तथा क्षेत्राफल की दृष्टि से 28 वें स्थान पर है।

साक्षरता

        जिले की कुल साक्षरता दर 44.63 प्रतिशत है। इसमें पुरुष साक्षरता दर 60.45 है जबकि महिला साक्षरता दर 28.43 है। शहरी साक्षरता दर 84.27 प्रतिशत तथा ग्रामीण साक्षरता दर 41.28 प्रतिशत है।

बांसवाड़ा जिला: की तहसीलवार जनसंख्या व साक्षरता                                    






































































साँस्कृतिक गौरव

बाँसवाड़ा वह जिला है जो आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक आधारों के साथ हमेशा अपने साँस्कृतिक गौरव का दिग्दर्शन कराता रहा है। इस क्षेत्रा में हर धर्म-सम्प्रदाय के लोग सौहार्दपूर्ण वातावरण में पूरे समन्वय केे साथ रहते हैं तथा एक-दूसरे के पर्व-त्योहारों और उत्सवो ंमें शरीक होते हैं।

अतीत से लेकर अब तक भारतीय संस्कृति की जडं़े इस अँचल में जमी रही हैं। क्षेत्रा में वैदिक काल से लेकर आधुनिक काल तक की साँस्कृतिक परम्पराओं का सहज समन्वय देखा जा सकता है। लोढ़ी काशी के नाम से प्रसिद्ध बांसवाड़ा वह पुण्य धरा है जहाँ सभी देवी-देवताओं और उपासना पद्धतियों की गंगा बहती रही है। यहाँ चारों वेदों के विद्वान रहे हैं जिनमें यजुर्वेदियों का बाहुल्य है। यहाँ के वैदिक विद्वान काशी विद्यापीठ, वाराणसी में अध्यापन कार्य करते रहे हैं। अग्नि देव की उपासना करने वाले साधकों के साथ ही यज्ञ-यागादि यहाँ की परम्परा में शामिल हैं।

बाँसवाड़ा आध्यात्मिक वैभव की दृष्टि से भी दुनिया में उन्नीस नहीं है। ज्ञान, भक्ति और कर्मयोग की त्रिवेणी इस क्षेत्रा में आदिकाल से बह रही है। यहाँ मावजी महाराज, दुर्लभजी, गोविन्द गिरि, गवरी बाई, केशवाश्रम, बड़लिया महाराज भोलानाथ, भैरवानन्दजी, भगवानदासजी, नाथजी महाराज ,स्वामी रामानन्द सरस्वती जैसी विभूतियों की अक्षुण्ण परम्परा ने भक्ति सरिताओं के माध्यम से जन-जन की चेतना को जगाया है। दैव वाणी संस्कृत का भी यह गढ़ रहा है। इसके साथ ही तंत्रा-मंत्रा-यंत्रा, सामुद्रिक रहस्य, ज्योतिष, स्वर विज्ञान, रमल शास्त्रा, योग साधना आदि प्राचीन विद्याओं के क्षेत्रा में यह इलाका विख्यात रहा है।

दर्शनीय स्थल
      बांसवाड़ा जिले में कई ऐसे स्थान है जो पर्यटकों को स्वतः ही अपनी ओर आकर्षित करते हंै इसका प्रमुख कारण यहां की प्राकृतिक पृष्ठभूमि है। बांसवाड़ा जिले में पुरातत्व, इतिहास, धर्म-श्रद्धा और नैसर्गिक रमणीय स्थलों से लेकर आधुनिक दर्शनीय स्थलों की सुन्दर श्रंखला विद्यमान है। 



त्रिपुरा सुन्दरी

बांसवाड़ा से 17 किलोमीटर दूर उमराई गांव के पास वनाच्छादित पहाड़ियों के मध्य त्रिपुर सुन्दरी देवी का प्राचीनतम मंदिर शाक्त साधनाओं का केन्द्र बिन्दु रहा है। देश-विदेश में प्रसिद्ध यह दैवी धाम केवल जनास्था ही नहीं प्रमुख पर्यटन तीर्थ के रूप में ख़ासी पहचान रखता है। देश के विभिन्न हिस्सांे तथा विदेशों से यहाँ आने वाले श्रद्धालुआंे एवं पर्यटकों की  यहाँ वर्ष भर रेलमपेल मची रहती है।

इस मन्दिर की प्राचीनता के बारे में कोई संदेह नहीं है तथापि इसकी स्थापना के संदर्भ में अधिकृत जानकारी का उल्लेख कहीं प्राप्त नहीं है। ऐसा माना जाता है कि इसका निर्माण सम्राट कनिष्क से पूर्व हुआ है। इस मन्दिर के निकट कनिष्क के समय का शिवलिंग भी विद्यमान है। कुछ विद्वान तीसरी शताब्दी से पहले इसे बना मानते हंै। संवत 1540 के एक शिलालेख के अनुसार इसके आस-पास दुर्गापुर नगर बसा था, जिसका शासक नृसिंह शाह था।

मंदिर क्षेत्रा के इर्द-गिर्द शिवपुरी, शक्तिपुरी तथा विष्णुपुरी नामक तीन दुर्ग थे। इसी कारण इसे त्रिपुरा सुन्दरी नाम दिया गया अन्यथा इस मंदिर में विद्यमान मूर्ति त्रिपुर सुंदरी के मूल स्वरूप से पूरी तरह भिन्न है और यह त्रिपुर सुंदरी नहीं होकर महिषासुरमर्दिनी की मूर्ति है, लेकिन जन श्रद्धा के कारण त्रिपुर सुंदरी, त्रिपुरा महालक्ष्मी, तरतई माता आदि नामों से जाना जाता है। इस विशालकाय मूर्ति की विशेषता यह भी है कि यह सांगोपांग एक ही शिला से उकेरी गई है। इस मूर्ति के बारे में कहा जाता है कि यह तीनों संध्याओं में अलग-अलग रूपों में दिखती है।

शास्त्राीय प्रमाणानुसार मंदिर के पृष्ठ में त्रिदेव, दक्षिण भाग में काली तथा उत्तर में अष्टभुजा सरस्वती का मंदिर था, जिसके अवशेष आज भी विद्यमान हैं।

ऐतिहासिक विशालकाय मंदिर के गर्भगृह में सिंह पर आरूढ़ अठारह भुजाओं वाली देवी की बड़ी ही आकर्षक एवं ओजपूर्ण मूर्ति है। देवी अष्टादश भुजाओं में विविध प्रकार के दिव्य आयुध धारण किए है।माथे पर  मुकुट इनके स्वरूप को बहुगुणित कीर्तिमान करता है। माँ त्रिपुरा की श्यामवर्ण की यह भव्य एवं तेजापु×ज मूर्ति अलौकिक एवं अद्भुत है जिसके दर्शनमात्रा से ही दर्शनार्थी आत्मविभोर हो सहज आकर्षण के पाश में बँध जाता है और सहज साक्षात्कार जैसा आभास मिलता है। मूर्ति के प्रभामंडल में कई छोटी-छोटी मूर्तियां है जो शिल्पकला का अनूठा और सुन्दर उदाहरण हंै। मूर्ति के अधोभाग में संगमरमर के काले एवं चमकीले प्रस्तर पर सुन्दर ‘‘श्रीयंत्रा’’ अंकित है जिसका अपना तांत्रिक महत्व है।

अनेक तपस्वियों एवं शाक्त साधकों की यह सिद्ध स्थली रहा है, जहाँ रह कर इन्होंने दैवी से साक्षात्कार किया। यही कारण है कि शक्तिपीठों व उप पीठों केे संबंध में पुराणों में वर्णित अधिकृत सूची में स्थान न होते हुए भी त्रिपुरा सुन्दरी तीर्थ शक्तिपीठ के बराबर का दर्जा रखता है। देवी के चमत्कारों की अनेकों गाथाएँ बहुश्रुत हैं। इनमें कई घटनाओं का संबंध महाराज विक्रमादित्य, सिद्धराज जयसिंह, मालवा केे नरेश जगदेव परमार आदि से जोड़ा जाता है। त्रिपुरा सुन्दरी गुजरात के महाराजा जयंिसंह सोलंकी की ईष्टदेवी थी। राजा-महाराजाओं के जमाने में त्रिपुरा सुन्दरी को विशेष महत्व प्राप्त था।


सिद्धि विनायक तीर्थ

बाँसवाड़ा-डूंगरपुर मार्ग पर तलवाड़ा के निकट त्रिपुरा सुन्दरी मार्ग पर स्थित प्राचीन सिद्धि विनायक महातीर्थ देश के दुर्लभ एवं प्राचीन विनायक तीथों मेें एक कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

      ऐतिहासिक संदर्भों के अनुसार मालवा के परमार राजा नरवर्मा पर अपनी जीत की खुशी में विक्रम संवत् 1166 में वैशाख शुक्ल तृतीया ( 5 अप्रैल 1109) को यह मूर्ति सिद्धराज ने विधि-विधान के साथ प्र्रतिष्ठापित की। 

      सिद्धि विनायक तीर्थ में संगमरमर से बने मंदिर के गर्भगृह में भगवान गणेशजी की छह फीट आकर्षक एवं असाधारण प्रतिमा है जो दुर्लभ एवं मूर्ति शिल्प का अपनी तरह का बेजोड़ उदाहरण है।




सूर्य मन्दिर

      सिद्धि विनायक मन्दिर के पृष्ठ भाग में सूर्य मंदिर है जिसके गर्भगृह में ढाई फीट ऊँचे कलात्मक अधिष्ठान पर 11 वीं सदी की भगवान भास्कर की साढ़े तीन फीट की श्वेत पाषाण प्रतिमा है।

      कोणार्क की तरह इस सूर्य मन्दिर में भी रथ चक्र और श्वेत पाषाणों पर निर्मित नवग्रह मूर्तियाँ थीं जिनके अवशेष पाए गए। इस मन्दिर के पास ही 12 वीं शताब्दी का बना लक्ष्मीनारायण का मन्दिर था जिसका जीर्णोद्धार कार्य जारी है। इन्हीं मन्दिरों के आस-पास खेतों में खुदाई से बारहवीं शताब्दी की शैव-वैष्णव और जैन मूर्तियाँ भी निकली हैं।
      इसके सामने कुछ ही दूरी पर द्वारिकाधीश का प्राचीन मन्दिर है। इसे गदाधर का मन्दिर भी कहते हैं। पूरी तरह पत्थरों से बने इस मन्दिर का प्रत्येक पाषाण  कलाकृतियांे की सुन्दर नक्काशी से परिपूर्ण है। इस मन्दिर की छत पर उत्कृष्ट कारीगरी देखने को मिलती है जो आबू के विमलशाह मन्दिर से कहीं उन्नीस नहीं है।


ब्रह्मा मन्दिर

          यहाँं यों तो सभी देवी-देवताओं के अनेकानेक प्राचीन देवालय हैं तथापि छींछ का ब्रह्मा मंदिर देश भर में प्रसिद्ध है। बाँसवाड़ा से 10 मील दूर छींछ गांव में जलाशय के किनारे ब्रह्माजी का अति प्राचीन मंदिर है। इसका निर्माण 12 वीं शताब्दी में हुआ ़है। इससे पूर्व ब्रह्माजी का आठवीं शताब्दी में बना मन्दिर था जिसमें सप्तधातु की ब्रह्मामूर्ति थी। इस देवालय का अनेकों बार जीर्णोद्धार होता रहा है।

          मंदिर के गर्भगृह में पाँच फीट ऊँची कृष्णवर्ण की घनी दाढ़ीदार एवं जटायुक्त ब्रह्माजी की भव्य मूर्ति है। छोटे से हंस की आकृतिनुमा ऊँचे अधिष्ठान पर खड़ी यह चतुर्मुख ब्रह्मामूर्ति शिल्प की दृष्टि से अद्भुत एवं मनोहारी है।

      बाँसवाड़ा राज्य के ऐतिहासिक संदर्भों के अनुसार आषाढ़ादि विक्रम संवत 1593(चैत्रादि 1594) अमान्त वैशाख (पूर्णिमान्त ज्येष्ठ)वदी 1( ई.सं.1537, 26 अप्रैल) गुरुवार और अनुराधा नक्षत्रा के दिन महारावल जगमालसिंह के समय वैसी ही छोटी चतुर्मुख ब्रह्मा की मूर्ति प्राचीन वेदी पर स्थापित की गई।


वागड़ का पुरा धाम- अरथुना

अरथुना वागड़ क्षेत्रा भर में ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक दृष्टि से अपना एक विशिष्ट स्थान रखता है। वागड़ नवीं से बारहवी सदी तक परमार राजाओं के अधीन था एवं इसकी राजधानी अरथुना थी। उस समय में अरथुना कला एवं संस्कृति का एक प्रमुख केन्द्र था। मण्डलेश्वर मंदिर यहां का मुख्य शिवालय है। सर्वाधिक प्राचीन यह मंदिर मण्डलेश्वर चामुण्डराज द्वारा अपने पिता मंडलीक की स्मृति में विक्रम संवत् 1136 तद्नुसार 1080 ई. को स्थापित किया गया।  इसे मण्डलेश्वर मंदिर के नाम से जाना जाता है।

          यहां के मण्डलेश्वर शिवालय में गर्भगृह सभा मण्डप से काफी नीचे है जिसमें 2 फीट का बड़ा शिवलिंग है जिसकी जलाधारी तीन फीट गोलाई वाली है। इस मन्दिर का निर्माण दक्षिण भारतीय शैली में हुआ है।

मण्डलेश्वर के पास छोटी मन्दरी है जिस पर सूक्ष्म तक्षण कला है। यहां कलात्मक छतरी भी है। मन्दिर के तल से लेकर शिखर तक सुन्दर कारीगरी का दिग्दर्शन होता है। मन्दिर के उत्तरी हिस्से में गौमुख है जिसका मुँह मगर के आकार का है।

इसके अलावा हनुमानगढ़ी, नीलकण्ठ, कुंभेश्वर, चैंसठ योगिनी, शैवाचार्य, हनुमान, सोमेश्वर, जैन मन्दिर समूह आदि अनेक देवालयों की श्रृंखला है जिनका शिल्प-स्थापत्य, मूर्तिकला अद्भुत है। मुख्य मन्दिर के सम्मुख कलात्मक कुण्ड है। वागड़ का यह पुराधाम अरथुना जगविख्यात है। यहां कई प्राचीन मन्दिर और मूर्तियां खुदायी में निकली हैं जिन्हें पुरातात्विक दृष्टि से बेशकीमती एवं दुर्लभ माना जाता है। यहाँ के मन्दिरों में शैव, वैष्णव, जैन आदि सम्प्रदायों का समन्वय मिलता है। अरथुना का कलात्मक दीप स्तम्भ देखने लायक है।

मन्दिरों में कहीं कहीं कृशेरी, नरमुण्ड, श्वान, पाश कमण्डल, नागपाश, बिच्छू, ग्रहों, इन्द्र आदि की प्रतिमाएं है। एक मन्दिर पर 84 आसन, 64 येागिनियों आदि की मूर्तियां हैं जबकि अन्य मन्दिर के बाहर सुरसुन्दरी, भैरव, आदि की प्रतिमाएं हैं। अरथुना में खुदाई से निकली प्राचीन मूर्तियां कलकत्ता व बीकानेर के म्यूजियम में संग्रहित हैं जबकि ढेरों मूर्तियां अरथुना में ही संग्रहित पड़ी हैं। अरथुना के प्रसिद्व शिव मंदिर की कला आबू के देलवाड़ा मंदिर से समक्ष है। वहीं माता कंकाली की अद्भुत एवं अद्वितीय मूर्ति तत्कालीन कला वैभव की अच्छी तरह झलक दिखाती है।

इस क्षेत्रा में खेतों मंे हल के साथ ईटंे बाहर निकल आती हैं जिनसे पता चलता है कि यहाँ धरती के भीतर अनेक मंदिर व प्रासाद दबे पड़े हैं। जनश्रुति के अनुसार पाण्डवों ने अपना कुछ समय अरथुना क्षेत्रा में बिताया था।


पाराहेड़ा
बांसवाड़ा से करीब चालीस किलोमीटर दूर अन्तरंग गोपीनाथ का गढ़ा के पास बसा पाराहेड़ा गांव  शिल्प सौन्दर्य और पुरातत्व का धाम है। इसे ‘पाणा हेड़ा’ भी कहा जाता है। स्थानीय भाषा में सिरे को ‘हेड़ा’ तथा पत्थर को ‘पाणा’ कहते हैं। गाँव के मुहाने पत्थरों का मन्दिर समूह होने से इसे ‘पाणा हेड़ा’ नाम मिला। पाराहेड़ा संभवतः इसी का अपभं्रश है।

पाराहेड़ा गांव में नांगेला तालाब के किनारे अवस्थित मंदिर समूह में कई मंदिर हैं, जो अत्यधिक प्राचीन हैं पर जीर्ण-शीर्ण होते जा रहे हैं। इस ऊंची टेकरी पर स्थित शिवालय को पाराहेड़ा शिवालय के नाम से जानते हैं। मंदिर की बनावट उत्तर भारतीय शैली के अन्य मंदिरों से भिन्न और विशिष्ट है। यह समूचा क्षेत्रा प्राचीनकाल में अति समृद्ध और धर्म श्रद्धा का अप्रतिम केन्द्र रहा है। मंदिर का निर्माण ईस्वी सन् 1059 में बताया जाता है। मुख्य शिवालय विभिन्न मंदिरों और छतरियों के बीच पूर्वाभिमुख बना हुआ है। पूरी तरह पत्थरों से निर्मित इस मन्दिर का शिल्प-स्थापत्य हर किसी को चकित कर देने वाला है।

मुख्य मंदिर मण्डलेश्वर या मंगलेश्वर के बाहरी ओर के परिक्रमा भाग में जिस तरह की नन्हीं-नन्हीं बारीक मूर्तियां उत्कीर्ण हैं वह रति क्रीड़ा के मनोविज्ञान एवं व्यावहारिक धरातल को बड़े ही आकर्षक एवं मनोहारी ढंग से चित्रित करती दिखायी गयी हंै। यह मूर्तियां इस प्रकार की अन्य मूर्तियों से भिन्न एवं बहुआयामी कला-कौशल से परिपूर्ण हंै।


बेणेश्वर
बेणेश्वर टापू सोम व माही नदी का डेल्टा है जिसे स्थानीय भाषा में बेणका कहा जाता है। इसी आधार पर इस टापू का नाम ’ बेणेश्वर ’ पड़ा । जाखम नदी कुछ किलोमीटर पहले ही इसमें मिल जाती है। इस तरह बेणेश्वर के संगम तीर्थ में तीन नदियों माही, सोम व जाखम का जल समाहित रहता है। राजा बलि ने यहीं पर यज्ञ किया था।

घोटिया आम्बा
          घोटिया आम्बाः बागीदौरा पंचायत समिति के बारीगामा ग्राम पंचायत में महाभारत काल की याद दिलाने वाला घोटियाआम्बा का पौराणिक आस्था स्थल है । यहां पाण्डवों ने वनवास के समय विहार किया था ।

जन मान्यता के अनुसार इन्द्र द्वारा दी गई आम की गुठली को पाण्डवों ने यहां रोपा था। पाण्डवों ने भगवान श्रीकृष्ण की सहायता से 88 हजार ऋषियों को यहां भोजन कराया था । घोटिया आम्बा स्थल पर आम्र वृक्ष जन आस्था का केन्द्र है। हर साल विक्रम संवत् के अंतिम दिन घोटिया आम्बा पर विशाल मेले भरता है। इसमें करीब दो लाख मेलार्थी हिस्सा लेते है। यहीं पर सुरम्य केलापानी, झरना, कदली के पेड, पहाड़ों में मिलने वाले चावल, गो-मुख से झरता पवित्रा जल, पाण्डव कुण्ड, नर्मदा कुण्ड, घोटेश्वर शिव व पाण्डव कुल की मूर्तियां तथा अन्य देवालय श्रृद्धा के केन्द्र हैं।

अंदेश्वर तीर्थ
कुशलगढ़ के समीप अंदेश्वर पाश्र्वनाथ अतिशय जैन तीर्थ है जहाँ प्रतिवर्ष कार्तिक पूर्णिमा को विशाल मेला भरता है। लोक आस्था के इस परम्परागत केन्द्र पर सभी धर्मांे के लोग आते हैं। इस इलाके में प्राचीन महत्व के मगरदा, मंगलेश्वर स्थल हैं जिनका पुरातात्विक महत्व कम नहीं है।



वनेश्वर मन्दिर समूह
बांसवाड़ा शहर के पूर्वी हिस्से में कागदी नदी के मुहाने वनेश्वर मन्दिर समूह अत्यन्त प्राचीन एवं ऐतिहासिक है। यह  धर्म और श्रृद्धा का प्रमुख केन्द्र है। इसी खासियत यह है कि यहां मनोरम वातावरण के बीचं भगवान वनेश्वर, नीलकण्ठ एवं धनेश्वर स्वयंभू शिव के रूप में विराजमान हैं। एक ही परिसर में तीन स्वयंभू शिवलिंग प्रायःतर बहुत कम दिखने में आते हैें। यही पर सदियों पुराने बौद्धस्तूप व प्राचीन जलकुण्ड इत्यादि हैं। वहीं कलात्मक धार की छतरी और अन्य देवालय हैं। वनेश्वर परिसर में मोतीमाता श्रृद्धा का केन्द्र है जहां बीमारों, लूले-लंगड़ों और खासकर माताजी के प्रकोप से पीड़ितजनों की व्याधियों का शमन होता है।

गायत्राी मंदिर सहित कई छतरियां व छोटी-छोटी मंदरियां यहां की धार्मिक भावना को बहुगुणित करती हैं।  इसके अलावा कई शिवलिंग, हनुमानजी, मानस भवन, विभिन्न डेरियों, आदि की वजह से यह प्रमुख धर्म धाम बना हुआ है। इसके पास ही काँच की कारीगरी का कमाल दिखाने वाला द्वारिकाधीश मन्दिर, टेकरी पर भजलेराम हनुमान मन्दिर सहित अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियाँ व छोटे-‘छोटे मन्दिर हैं।

वनेश्वर महादेव का मन्दिर गुजरात के अणहीलपुर पाटण के राजा वनराज चावड़ा ने बनवाया था। उन्हीं के नाम से इसे वनेश्वर या वनराज भी कहा जाता है।


राजमहल
पुराना महल

          शहर के दक्षिण-पूर्व में समाई माता पर्वत पर पुराने राजमहल के खण्डहर अवस्थित हैं। मान्यता है कि बाँसवाड़ा पहले इस पर्वत के आस-पास बसा हुआ था लेकिन अब यहाँ ये अवशेष ही इसकी साक्षी देते हैं। इसका भव्य शिल्प एवं स्थापत्य देखकर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि इस राजमहल के निर्माण के वक्त शिल्प-स्थापत्य कला कितनी उन्नत व अनुपम रही होगी। राजमहल के आगे सिंहद्वार है जो जीर्ण-शीर्ण हो चुका है व दो खम्भे ही अब शेष बचे हैं।

          समूचा महर्ल इंट-चूने से बना हुआ है, पत्थर के खम्भों को छोड़ लोहा-पत्थर का उपयोग कहीं नहीं हुआ है। ईंटों का विन्यसन व आधारहीर्न इंटों से बना मेहराब देखने लायक है। यह मुख्य रूप से तीन भागों में बना हुआ है। पश्चिमाभिमुख झरोखे से दूर-दूर तक की टोह ली जा सकती है। ऊपर छत बनी हुई है जिस पर ईंटों की तेरह सीढ़ियों से होकर जाया जाता है। महल के नीचे एक तहखाना है जिसमें उतरने के लिए भी सीढ़ियाँ बनी हुई हैं। पास ही स्मृति शिलाखण्ड ‘‘चीरे’’ हैं। पहाड़-शिखर पर अवस्थित इस महल के खण्डहर के आस-पास चारों ओर ईटों के टुकड़े बिखरे पड़े हैं। सुरक्षा के अभाव में इस पुरातात्विक महत्व के स्थल से लोर्ग इंटे निकाल ले जाते रहे हैं। यह ईटें सामान्य से कुछ बड़ी व अधिक मजबूत हैं।

          बाँसवाड़ा के अतीत से रिश्ता रखने वाले इस प्राचीन राजमहल के बारे में बताया जाता है कि यहाँ किसी समय बाँसिया भील का कब्जा था, जिसे मारकर जगमालसिंह ने अधिकार जमाया।

बाँसवाड़ा शहर के दक्षिण-पूर्व में अवस्थित इन पुरा स्थलों की ओर पर्याप्त ध्यान देकर विकसित किया जाय तो यहाँ के पर्यटन विकास को नये आयाम मिलेंगे वहीं प्राचीन महत्व के स्थलों का गौरव भी बरकरार रह सकेगा ।

जैन मन्दिर

बांसवाड़ा जिले में शहर सहित विभिन्न गांवों-कस्बों में प्राचीनकालीन जैन मन्दिरों में सदियों पुरानी जैन मूर्तियां हैं। जिला मुख्यालय से 30 किलोमीटर दूर हिरन नदी के तट पर बसे कलिंजरा कस्बे के जैन मन्दिर प्रसिद्ध हैं। यहाँ एक बड़ा पूर्वाभिमुख शिखरबन्द जैन मन्दिर है। इसके आजू-बाजू तथा पीछे एक-एक शिखरबन्द मन्दिर हैं।

छतरियाँ व दरगाह

बांसवाड़ा में छतरियों का भी अपना इतिहास रहा है। यहाँ की छतरियों में राजतालाब स्थित भगवानदासजी की छतरी, उदासी महाराज की छतरी, भैरवानंदजी की छतरी, वनेश्वर प्रां्रगण में धार की छतरी आदि प्रमुख हैं। वनेश्वर शिवालय से कुछ आगे तत्कालीन रियासत के शासकों की सुन्दर छतरियां हैं।

शहर के दक्षिण में भवानपुरा में संत अब्दुल्ला पीर का मकबरा स्थित है जो बोहरा मुसलमानों के लिए श्रद्धा केन्द्र है। इस स्थान पर लगने वाले सालाना ऊर्स में दूर-दूर से जायरीन आते व जियारत करते हैं।

मठ

जिले में विभिन्न सम्प्रदायों के मठों ने आध्यात्मिक और नैतिक चेतना के लिए लोक जागरण गतिविधियों को नवीन ऊर्जा दी है। इनमें कई मठ बहुत पुराने हैं। इनमंें लालीवाव मठ, नाथजी महाराज की टेकरी, मठ मंगलेश्वर आदि विभिन्न अखाड़ों से संबंधित हैं।


प्राकृतिक स्थल

जिले में पर्वतीय उपत्यकाओं के बीच अनेक नैसर्गिक सौन्दर्य पूर्ण स्थल हंै। इनमें जुआफाल, आनंदसागर(बाईतालाब), भीमकुण्ड, रामकुण्ड आदि प्रमुख हैं। बाईतालाब के समीप दो प्राचीन कल्पवृक्ष हैं जिनके प्रति अगाध जनास्था देखने को मिलती है।

बांसवाड़ा शहर के पूर्व में प्रतिवेशी पहाड़ियों के बीच बने गर्त में बाई तालाब नामक विशाल तालाब है जिसे अब आनंद सागर नाम दिया गया है। इसे महारावल जगमाल की रानी द्वारा निर्मित बताया जाता है। बांसवाड़ा-दाहोद मार्ग पर 10 किलोमीटर दूर सुरवानिया बाँध, घाटोल के समीप हेरो बांध सहित जिले में कई बांध और तालाब पिकनिक स्पाॅट के रूप में प्रसिद्ध हैं।

जिले के विभिन्न हिस्सों में कलात्मक प्राचीन बावड़ियाँ विद्यमान हैं। इनमें से ज्यादातर पेयजल वितरण के काम आ रही हैंे। इसी प्रकार वनेश्वर कुण्ड सहित कई कलात्मक कुण्ड भी बांसवाड़ा की प्राचीन धरोहरें हैं।



आधुनिक तीर्थ माही बाँध

 प्रदेश व देश भर में बांसवाड़ा की पहचान माही बांध की वजह से अलग ही है। जनजाति अंचलों में सिंचाई के जरिए हरित क्रान्ति ,मत्स्य पालन, पर्यटन विकास सहित अनेक आयामों में माही बांध की अहम भूमिका ऐतिहासिक विकास का दिग्दर्शन कराती है।

बांसवाड़ा मुख्यालय से 17 कि.मी. उत्तर पूर्व में माही नदी पर बने इस बांध की कुल लम्बाई 3.10 किमी. है जिसमें से 2.60 किमी. मिट्टी का बांध एवं 0.42 किमी. पक्का बांध बनाया गया है । माही का पानी बिजली उत्पादन के क्षेत्रा में भी मदद दे रहा है।

इसके साथ ही माही बाँध की नहरों में पानी वितरण के लिए शहर के पूर्वी छोर में निर्मित कागदी पिक अप वियर का विशाल परिक्षेत्रा में फैला जल भण्डार, अंकलेश्वर व विजवामाता मन्दिर, रमणीय उद्यान और चहुँ ओर पसरा नैसर्गिक सौन्दर्य इस स्थल को नवीन पर्यटन धाम के रूप में दर्शाता है। इसके साथ ही जिले में माही व कडाना के जलभराव क्षेत्रा और अन्य जलप्रधान दर्शनीय स्थल विकसित हुए हंै।

बाँसवाड़ा-रतलाम मार्ग पर माही नदी पर बना सेतु उत्तर-पश्चिम भारत का सबसे बड़ा पुल है। इसे गेमन इण्डिया पुल के नाम से भी जाना जाता है।



प्रवासी पक्षियों ने खोला पर्यटन का नवीन द्वार

बांसवाड़ा जिले की आबोहवा देशी-विदेशी प्रवासी पक्षियों को रास आ गई है। विपुल जलराशि, विशाल जलाशयों और निद्र्वन्द्व विहार के लिए उपयुक्त माहौल की वजह से जिले में प्रवासी पक्षियों की जल क्रीड़ाएं मन मोहती रही हंै। इससे पर्यटन को बढ़ावा मिलने की भरपूर संभावनाएं हैं।

बाँसवाड़ा जिले में माही तथा कड़ाणा के बैक वाटर और तालाबों की अधिकता के कारण पक्षियों के लिए अनुुकूल वातावरण है । बांसवाड़ा में लगभग डेढ़ सौ से ज्यादा प्रजातियों के पक्षी हैं। ख़ासकर प्रवासी पक्षियों के लिए यहां की आबोहवा अत्यन्त अनुकूल है। यही वजह है कि हर साल बड़ी संख्या में विदेशी पक्षी जिले में आते हैं। जिले के विभिन्न जलाशयों में हजारों किलोमीटर दूर से आने वाले विभिन्न किस्मों के इन प्रवासी पक्षियों को हर साल देखा जा सकता है। बांसवाड़ा के प्रवासी पक्षियों पर ‘‘बर्डिंग इन बांसवाड़ा’’ तथा ‘‘बर्डिंग बेस्ड इको टूरिज्म’’ शीर्षक से पुस्तक व फोल्डर भी प्रकाशित किया जा चुका है।

बर्ड टूरिज्म की व्यापक संभावनाओं वाले इस जिले में पक्षी दर्शन जैसे कार्यक्रमों को अमल में लाया जा रहा है। बाँसवाड़ा आने वाले पक्षियों की संख्या व प्रजातियों में बढ़ोतरी हो, इसके लिए यह जरूरी है कि पक्षियों को शान्त वातावरण मिले तथा मछली पकड़ने पर रोक लगे।

मेले-पर्व-त्योहार

          यह समूचा अंचल उत्सवी माहौल से भरा रहा है। यहां के मेलों-पर्वो व अन्य आयोजनों में बेणेश्वर, घोटियाआम्बा, विट्ठलदेव,मदारेश्वर, अंदेश्वर, मानगढ़, मंगलेश्वर, घूड़ी रणछोड़, अनंत चतुर्दशी, देवझूलनी, नवरात्रि, अष्टमी, मंशाव्रत, गोपेश्वर, कलाजी आदि के मेले, रथयात्रा, होली-दीवाली, दशहरा, राखी, ईद, मोहर्रम, उर्स आदि महत्वपूर्ण है।

रथयात्रा

          भाद्रपद शुक्ल प्रतिपदा से चतुर्थी तक अँचल के विभिन्न तहसील मुख्यालयों तथा बड़े कस्बों में रथयात्रा का आयोजन श्रद्धा और उल्लास का सागर उमड़ाता है। जैन धर्मावलम्बियों की इस उत्सवी धार्मिक परम्परा में जैन मन्दिरों से भगवान की गणगोटी(लघु रजत रथ) तथा सूक्ष्म कलाकारी से युक्त एवं रजत छत्रों से सुसज्जित आकर्षक काष्ठ रथों की यात्रा गाजे-बाजे के साथ निकाली जाती है।

          बाँसवाड़ा शहर सहित अनेक स्थानों पर यह उत्सव दो दिन धूम मचाता है। इसमें रथयात्रा के पड़ाव स्थल व जलाशय के किनारे धार्मिक अनुष्ठान होते हैं। रथयात्रा के मुख्य पड़ाव स्थल पर लगने वाले मेलों में सभी वर्गों के हजारों मेलार्थी हिस्सा लेते हैं। इनमें ग्रामीण मेलार्थी बहुतायत में होते हैं। रथयात्रा के अवसर पर डाण्डिया व गैर नृत्य भी देखने लायक होता है।



आँवली ग्यारस
         होली के पहले आने वाली आँवली ग्यारस(फाल्गुन शुक्ल एकादशी) को जिले में कई स्थानों पर मेले भरते हैं। इनमें घाटोल तहसील के मोटागांव के समीपव घूड़ी रणछोड़ वैष्णव तीर्थ का दो दिवसीय परम्परागत मेला प्रसिद्ध है। इनमंे हजारों मेलार्थी हिस्सा लेते हैं। तलवाड़ा के पास भीमकुण्ड व जिले में अन्य स्थानों पर भी मेले भरते हैं।

          आँवली ग्यारस को आदिवासी क्षेत्रों मंे दाम्पत्य की नींव डालने वाले उत्सव के रूप में मान्यता प्राप्त है। इस दिन कुँवारियाँ और कुँवारे आँवला वृक्ष की पूजा व परिक्रमा करते हैं और पसन्दीदा जीवनसाथी पाने के लिए प्रार्थना करते हैं। लोक मान्यता है कि इससे मनचाहा जीवनसाथी मिल जाता है।


मंछाव्रत चैथ

          मंछाव्रत(मंशाव्रत) बांसवाड़ा जिले में मनेाकामनापूर्ति के लिए किया जाने वाला सबसे बड़ा और व्यापक व्रत है। इसमें श्रावण मास के प्रथम सोमवार से अनुष्ठान आरंभ कर पूरे चार माह किया जाता है। इस दौरान् शिवालयों में पूजन-अर्चन, कथा श्रवण और व्रत का पालन किया जाता है। इस व्रत का उद्यापन चार माह बाद कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को परम्परागत विधि-विधान से किया जाता है।  इस दिन क्षेत्रा भर में हर कहीं इस व्रत की महिमा को देखा जा सकता है।



बहती थीं घी-दूध की नदियाँ

          जनजाति बहुल बांसवाड़ा जिले में कृषि और पशुपालन ही आम लोगों के लिए आजीविका के साधन थे। पूरे जिले में भारी संख्या में दुधारु पशुओं की वजह से यहाँ घी-दूध की नदियाँ बहती थीं।


आधुनिक परम्पराएं

          बांसवाड़ा जिले में कुछ वर्षों पूर्व गणेश प्रतिमाओं की स्थापना और अनन्त चतुर्दशी पर गणेश विसर्जन यात्रा तथा श्रावण के पहले सोमवार को कावड़ यात्रा अब यहाँ की उत्सवी परम्परा में शुमार हो चली है। अब गाँवों में भी इसका उत्तरोत्तर प्रसार हो रहा है।  इसी प्रकार पौष पूर्णिमा पर बेणेश्वर पदयात्रा महोत्सव भी प्रमुख परम्परा बन चला है।

आदिवासी संस्कृति का धाम

समूचे वागड़ अंचल में जनजाति लोक संस्कृति का ज्वार मेलों-पर्वों, त्योहारों-उत्सवों और विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक आयोजनों में उमड़ता रहता है। इस अंचल में समीपवर्ती गुजरात और मध्यप्रदेश की सरहदी लोक संस्कृति की झलक भी देखने को मिलती है। यहाँ बोलचाल की भाषा वागड़ी है। आदिवासी जनजीवन में लोक नृत्य और संगीत का समावेश पग-पग पर देखने को मिलता है।

अन्य 

जिले में नंदनी माता, सत्यनारायण, भगोरेश्वर, कपालेश्वर, पाडी रामेश्वर, अलोपेश्वर, संगमेश्वर, पारसोलिया सर्वेश्वर, द्वारिकाधीश, गोकर्णेश्वर, अरण्येश्वर, विश्वकर्मा मंदि, कूँपड़ा माताजी, माखीया माताजी, तलवाड़ा जैन मंदिर, नौगामा व कलिंजरा जैन मंदिर, अहिंसा मन्दिर हेरो, बोरवट हनुमान, मंगलेश्वर, मदारेश्वर, त्रयम्बकेश्वर, वनेश्वर मन्दिर समूह, अब्दुल्ला पीर दरगाह,  साई बाबा मंदिर, अंकलेश्वर माताजी, भण्डारिया हनुमान मंदिर, समाईमाता, गोपीनाथ का गढ़ा कल्लाजी मंदिर आदि अन्य दर्शनीय स्थल भी हैं।

लोक जागरण के प्रणेता

बांसवाड़ा जिले के ऐतिहासिक, सामाजिक, राजनैतिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक और विभिन्न गतिविधियों तथा लोक जागरण का सुदीर्घ इतिहास रहा है। यहाँ की रत्न श्रृंखला का योगदान ही है जिसकी बदौलत बाँसवाड़ा की प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर पर पहचान है।

इनमें गुरु गोविन्द गिरी, मामा बालेश्वर दयाल से लेकर स्वामी स्वतंत्रातानंद, स्वामी रामानन्द सरस्वती, स्वामी भैरवानंद, केशवाश्रम महाराज, उदासी महाराज, हरिदेव जोशी, भूपेन्द्रनाथ त्रिवेदी, शकुन्तला त्रिवेदी, धूलजी भाई भावसार, बाबा लक्ष्मणदास, पन्नालाल त्रिवेदी, मणिशंकर जानी, महात्मा चिमनलाल मालोत, पन्नालाल जोशी, डाॅ. शंकरलाल त्रिवेदी, हिम्मतलाल तरंगी, महारावल सूर्यवीरसिंह, हनुवंतसिंह, प्रभाशंकर पण्ड्या, अग्निहोत्राी पं. शिवशंकर आचार्य, नटवरलाल भट्ट, मोहनलाल आचार्य, प्रभाशंकर पण्ड्या, पन्नालाल नागर, श्रीपतिराय दवे, सेठ सेवालाल नागर, गोविन्दलाल याज्ञिक, मास्टर सूरजमल, धु्रवशंकर पाठक आदि का योगदान भुलाया नहीं जा सकता।

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